मगर अब भगाये क्या होत जब चिड़िया चुग गई खेत...?


दोस्तों, पानी को साफ करने के कई तरीके हैं जिनमें पानी को उबालने के पारंपरिक तरीके से लेकर कैंडल वाटर फिल्टर, मल्टी स्टेज शुद्धिकरण, क्लोरीनेशन, हैलोजन टैबलेट, यूवी (अल्ट्रावायलेट) रेडिएशन सिस्टम तक शामिल है, पानी को साफ करने के हर तकनीक का फायदा और नुकसान है, तकनीक को चुनने से पहले पानी के स्रोत और गुणवत्ता पर जोर दिया जाता है.

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पानी को साफ करने की तकनीक आरओ सिस्टम ने लोगों को खुब लुभाया है, इस तकनीक का पूरा नाम है रिवर्स ओस्मोसिस प्रोसेस यानी आरओ, इस तकनीक में पानी को बेहद तेज दबाव के साथ साफ किया जाता है, इस तकनीक में पानी में बैक्टीरिया होने की आशंका बेहद कम हो जाती है, यह पेयजल को साफ करने का उच्चस्तरीय तरीका माना जाता है, इस तकनीक को इतना प्रभावशाली माना जाता है कि पहले चरण में ही पानी का अशुद्धियां दूर हो जाती हैं, पानी पर दबाव डालकर पानी में से ज्यादातर बड़े कणों व ऑयन का अलग किया जाता है.

आर ओ (RO) का अविष्कार सन 1950 में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय अमेरिका में हुआ था, इस खोज का उद्देश्य था समुद्री गंदे खारे पानी को साफ कर पीने योग्य जल बनाना, 1977 में इस आर ओ फ़िल्टर का सर्वप्रथम उपयोग अमेरिका के फ्लोरिडा शहर में पानी को साफ कर पीने योग्य बनाने हेतु किया गया था, अमेरिकी नौसेना द्वारा आर ओ फ़िल्टर का उपयोग अपने नेवी जवानों को समुद्री पानी को साफ कर पीने का पानी उपलब्ध करने हेतु किया जाता है.

यह सिस्टम पानी को पांच चरणों में साफ करता है और उसे गंदगी, धूल, बैक्टीरिया आदि से मुक्त कर शुद्ध व मीठा बनाता है, आरओ प्रक्रिया में पानी को कई महीन झिल्लियों से गुजरना पड़ता है और इनसे गुजरने के बाद गंदा-से-गंदा पानी भी पीने लायक हो जाता है, झिल्लियां बिजली से संचालित होती है.

पहल चरण में संरक्षित बोरवेल से कच्चा पानी लेने के बाद इसे स्टोरेज टैंक में रख लिया जाता है, इस दौरान पानी के पीएच मान्य और टीडीएस (पानी में घुले मिनरल) का स्तर मापा जाता है, इसके बाद पानी को बैक्टीरियामुक्त करने के लिए कच्चे पानी के टैंक में वाणिज्यिक ग्रेड क्लोरिन मिलाया जाता है.

दूसरे चरण में पानी से बड़े कणों को हटाया जाता है, इसके लिए कच्चे पानी के टैंक से पानी को सैंड (रेत) फिल्टर में भेजा जाता है, इसके बाद पानी में मौजूद गंदगी का परीक्षण किया जाता है.

तीसरे चरण में सैंड फिल्टर से गंदगीमुक्त पानी को सक्रिय कार्बन फिल्टर से गुजरना पड़ता है, इस दौरान पानी में मौजूद किसी भी तरह की अवांछित गंध को दूर किया जाता है, पूरी प्रक्रिया के दौरान यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि पहले चरण में पानी में मिलाया गया क्लोरिन का कोई अंश शेष न रहा गया हो, इसमें क्लोरेटेक्स विधि का प्रयोग किया जाता है, चौथे चरण में सक्रिय कार्बन फिल्टर प्रक्रिया से प्राप्त पानी को रिवर्स ओस्मोसिस प्रक्रिया से गुजारना पड़ता है.

TDS मतलब Total Dissolved solid. अर्थात जल में घुले कणों की संख्या को टी डी एस कहते है,
खनिज लवण ( जैसे सोडियम पोटासियम कैल्सियम मेगनीसियम मैंगनीज आयरन आयोडीन क्लोराइड बाईकार्बोनेट ), कार्बनिक पदार्थ , अकार्बनिक पदार्थ , सूक्ष्म जीव (microorganisms ) आदि को सम्मिलित रूप से टी डी एस कहते है.

इसके बाद पानी के पीएच मान्य और टीडीएस का स्तर मापा जाता है, फिर पानी को स्टेनलेस स्टील के टैंक में जमा किया जाता है, इसके बाद ओजोनेटर पाइप के माध्यम से पानी को ओजोनाइज्ड किया जाता है, पानी को यूवी हाउसिंग में भेज दिया जाता है जहां यूवी लैंप की मदद से पानी में शेष बैक्टीरिया को मारा जाता है, इसके बाद माइक्रोन फिल्टर की मदद से पानी को छान लिया जाता है, इस दौरान विभिन्न स्तर पर पानी का शुद्धिकरण किया जाता है.

जिस पर महज 100 रुपए खर्च आता है, सिस्टम पानी से 86 फीसदी तक बैक्टीरिया खत्म कर देता है, पानी में किसी तरह की बदबू नहीं रहती, यही नहीं पानी को पालिश की जाती है, मैलापन दूर कर मैला रंग पानी से बाहर निकाल देता है, जबकि नई विधि रेत के फिल्टर से दस गुणा अधिक काम करती है, तीनों घड़ों में डाली गई राखी पांच से छह माह बाद बदल दी जाती है और चावल के छिलके की राख निशुल्क मिलती है.

आर ओ फ़िल्टर जल में प्राकृतिक रूप से मौजूद शरीर के लिए आवश्यक खनिज तत्वों को भी छान देता है, जिसके परिणाम स्वरुप शरीर में खनिज तत्वों की कमी हो जाती है, जिससे शरीर की हड्डी कमजोर हो जाती है, मांसपेशियों में एठन होती है.

पानी की बर्बादी-
एक लीटर आर ओ पानी बनाने में 7 लीटर पानी बर्बाद होता है, आर ओ मशीन से एक पाइप निकली रहती है जिससे पानी लगातार बहकर नाली में जाता रहता है, जिससे पानी का भूजल स्तर गिरता जायेगा, जिसके लिए हमारी आने वाली पीढियां माफ़ नहीं करेंगी.

बिजली की खपत
बिना बिजली के आर ओ मशीन नहीं चलती है, बिजली के बिल का बोझ बढ़ता है.

कर्ट्रिज़ बदलने का खर्च
लगभग साल डेढ़ साल में फ़िल्टर ख़राब हो जाता है, जिसे बदलने का खर्च लगभग 3 हजार न्यूनतम हटा है.

आर ओ पानी पीना कैंसर को बढ़ावा
आर ओ फ़िल्टर प्लास्टिक का बना होता है, तेज प्रेशर से पानी को फ़िल्टर से छाना जाता है जिससे कुछ मात्रा में प्लास्टिक का अंश भी पानी में घुल जाता है जिससे कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है.

आर ओ पानी का लगातार सेवन हार्ट अटैक का कारण
अमेरिका में ६ वर्षो तक 20000 स्वस्थ व्यक्तियों जिनकी उम्र 38 से 100 वर्ष के बीच थी पर एक शोध किया गया जो की 1 मई 2002 के अमेरिकन जर्नल ऑफ़ एपिडेमियोलॉजी में प्रकाशित हुई है, के मुताबिक लगातार आर ओ पानी पीने से शरीर में कैल्सियम और मैगनीसियम की कमी हो जाती है जिससे हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है.

आर ओ पानी एसिडिक ( अम्लीय) होता है.
आपको जानकर हैरानी होगी कि आपका मनपसंद चहेता आर ओ का जल एसिडिक होता है.

शुद्ध प्राकृतिक जल का PH 7 होता है.
आर ओ का पानी 5 से 6 PH का होता है, 5PH का पानी 7 PH वाले जल से 100 गुना अधिक एसिडिक होता है.

आर ओ पानी पीने से शरीर के खून का PH बदल जाता है.
एक रिसर्च के अनुसार एसिडिक पानी को न्यूट्रल करने के लिए शरीर को अधिक कार्य करना पड़ता है, जिसके एवज में शरीर से कैल्शियम और मैगनिशियम जो की हड्डी और दांत में रहता है धीरे धीरे क्षरण होकर कम होने लगता है.

इम्मुनिटी कम होना
आर ओ का पानी लगातार पीने से हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता immunity कमजोर हो जाती है, जिससे जल्दी ही रोग शरीर को जकड लेता है, रोग हो जाने पर रोग मुक्त होने में अधिक समय लगता है.

क्या है देसी सिस्टम :
तीन घड़े लेकर तीनों की तली में सुराग किया जाता है, सुराग के ऊपर नारियल की भूसी लगा दी जाती है और घड़ों में चावल की राख भर दी जाती है, फिर ऊपर वाले घड़े में पानी की टोंटी से पानी डाला जाता है, सबसे निचले घड़े से जो पानी आता है वह एकदम साफ होता है, इसमें बैक्टीरिया बहुत कम होता है.

बिना बिजली साफ पानी :
उद्योगपति विजय सेतिया के अनुसार ग्रामीण एरिया में साफ पानी की सबसे अधिक दिक्कत है, उनकी ग्रीन वर्ल्ड्स फाउंडेशन नामक संस्था शीघ्र ही हरियाणा के 20 गांवों में नए आरओ सिस्टम को लगाकर दिखाएगी, ताकि लोगों का रूझान इस ओर हो सके, केवल 100 रुपए खर्च कर आम आदमी साफ पानी ले सकेगा, उन्हें यह प्रेरणा अमेरिकन वैज्ञानिक डा. फ्रैंकले से मिली है, जिन्होंने चावल की राखी से बहुत से आविष्कार किए.

शुद्ध तो होता है किंतु स्वास्थ्य के हिसाब से पूर्णतः सुरक्षित नहीं होता...?

कीटाणु तो फिल्टर हो जाते हैं, अनेक संक्रामक बीमारियों से छुटकारा मिल जाता है लेकिन पानी में घुले लवण भी छन जाते हैं, इन लवणों में एक महत्वपूर्ण तत्व है कैल्शियम, विगत 20 सालों से जो लोग आर.ओ. का पानी या बॉटल्ड वाटर पी रहे हैं उनकी हड्डियों में ऑस्टियोपोरोसिस नामक समस्या उत्पन्न हो गई है—अस्थियां खोखली हो गई हैं.

बोतलों में बंद पानी जो बाजार में उपलब्ध है, जिसे मिनरल वाटर कहा जाता रहा है, वस्तुतः उसमें मिनरल हैं ही नहीं, पचास वर्षों से पानी बेचने वाली कंपनियां धोखा दे रही हैं, मिनरल वाटर के नाम पर “मिनरल रहित वाटर” सप्लाई कर रही हैं, कुछ ही समय पहले इस बात पर WHO का ध्यान गया, और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ कानून बनाये गए हैं, मगर अब भगाये क्या होत जब चिड़िया चुग गई खेत...?

वाटर किंग पैसा कमाने के लिए ऐसे किसी भी झूंठ का सहारा नहीं लेती है जिससे लोगों की सेहत और ज़िंदगी ख़राब हो, हम वही कहते हैं जो सेहत के लिए फ़ायदेमंद और सच है...!

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